Friday, August 31, 2018

शाहरुख़ की बेटी सुहाना ख़ान की तस्वीर मैगज़ीन में छपने पर विवाद क्यों?

फ़ैशन और लाइफ़स्टाइल मैगज़ीन 'वोग' के भारतीय एडिशन के कवर पेज पर शाहरुख़ ख़ान की बेटी सुहाना ख़ान की तस्वीर छपी है.
लेकिन सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना हो रही है.
कई लोगों ने लिखा है कि सुहाना ख़ान इस क़ाबिल नहीं हैं क्योंकि उन्होंने यहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ नहीं किया है.
'वोग' मैगज़ीन के कवर पेज पर अक्सर टॉप मॉडल्स, अभिनेत्रियों और मशहूर हस्तियों की तस्वीरें छपा करती हैं.
मैगज़ीन से बातचीत में सुहाना ने ख़ुद को 'छात्रा, थियेटर प्रेमी और भविस फ़ैशन शूट का स्टाइल वोग इंडिया की फ़ैशन डायरेक्टर अनाइता श्रॉफ़ अदज़ानिया ने तैयार किया है, जो शाहरुख़ ख़ान की एक पुरानी दोस्त हैं.
यह सुहाना का पहला फ़ोटोशूट और इंटरव्यू है.
मैगज़ीन ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर भी इस कवर पेज को साझा किया है और इसे 36,000 से ज़्यादा लाइक मिले हैं.स पर नाराज़गी जताने वालों में काम के लिए स्ट्रगल कर रही अभिनेत्रियां भी शामिल हैं. उन्होंने अपने अनुभव भी साझा किए हैं.
श्रुति टंडन ने लिखा है, "ये एक ऐसी चीज़ है जो वजूद में नहीं होनी चाहिए, पर है. ये है- परिवारवाद. इतने एक्टर हैं लेकिन सेलिब्रिटी के बच्चे, जिनकी एक भी फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई, वोग इंडिया के कवर पेज पर हैं. यह स्वीकार करने योग्य नहीं है."भिनेत्री भूमिका छेड़ा ने लिखा, "मैं संघर्ष कर रही एक अभिनेत्री हूँ और मैं आपको बताती हूँ कि सुहाना ख़ान के वोग इंडिया के कवर पेज पर छपने से मैं और बाक़ी लोग क्यों ग़ुस्से में हैं. मैं डीडी-1 के एक शो, तीन डिजिटल विज्ञापनों और कुछ एपिसोड्स में काम कर चुकी हूँ. सुहाना ने जब वोग इंडिया के दफ़्तर में क़दम रखा तो किसी ने नहीं कहा कि आप इसकी योग्यताएँ पूरी नहीं करती हैं." छोड़िए ट्विटर पोस्ट @ 
ष्य की स्टार' बताया है.
सुहाना ने इसी इंटरव्यू में अपने लिए नकारात्मक बातों पर जवाब भी दिया है.
उन्होंने कहा, "मैं ख़ुद से कहती हूँ कि नफ़रत करने वाले नफ़रत ही करेंगे. लेकिन मैं ईमानदारी से ये नहीं कह सकती कि मैं इन बातों से बिल्कुल बेअसर रहती हूँ."
सुहाना ने कहा, "ये परेशान करता है, लेकिन मैं ख़ुद से कहती रहती हूँ कि दूसरे लोगों की समस्याएँ इससे भी बड़ी हैं."
वोग ब्यूटी अवॉर्ड्स में ख़ुद शाहरुख़ ख़ान ने ही इस कवर को लॉन्च किया.
इस मौक़े पर शाहरुख़ ने कहा, "मेरे लिए हालात अच्छे रहे लेकिन बच्चे तो बच्चे ही होते हैं और इस बदलती दुनिया में उन्हें थोड़ी सहूलियत देने, ख़ुद पर यक़ीन करने और अपनी क़ीमत समझाने के लिए कई बार आपको दोस्तों की मदद की ज़रूरत होती है. इसलिए मैं वोग का धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने मेरी बेटी को अपने कवर पेज पर जगह दी."
शाहरुख़ ने ये भी कहा, "मैं उम्मीद करता हूँ कि ये न माना जाए कि सुहाना को ये इसलिए मिल गया क्योंकि वो शाहरुख़ ख़ान की बेटी है."गज़ीन से बात करते हुए शाहरुख़ ने ये भी कहा है कि वो अपने बच्चों को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए ख़ुद काम करते देखना चाहते हैं.
शाहरुख़ ने कहा, "हमारे कुछ दोस्त हैं जो हमारे बच्चों को अपना ही समझते हैं. वो उन्हें (सुहाना) लॉन्च करने को तैयार हैं. लेकिन मैं कहता रहता हूँ कि मैं नहीं चाहता कि उन्हें सितारे की तरह पेश किया जाए. मैं चाहता हूँ कि वे तब लॉन्च किए जाएं, जब वे ठीक-ठाक एक्टर बन जाएं."
इंटरव्यू में सुहाना ने बताया है कि वो अभिनेत्री बनने से पहले पढ़ाई ख़त्म करना चाहती हैं.
उन्होंने बताया कि वोग के कवर पेज पर छपने के प्रस्ताव पर उनके माँ-पिता ने उन्हें अच्छे से सोच लेने को कहा था.
उन्होंने कहा, "जब मेरे माँ-पिता ये प्रस्ताव लेकर आए तो मैं एक्साइटेड थी. मैं तुरंत हाँ कहना चाहती थी, लेकिन वो चाहते थे कि मैं सोचूं. क्योंकि ये एक सार्वजनिक चीज़ थी. वे चाहते थे कि मैं इससे आत्मविश्वास हासिल करूं, उसे खोऊं नहीं."

Friday, August 17, 2018

煤电厂的诱惑:波黑面临艰难抉择

矿工们见面寒暄不会说日安,而会说祝你好运,”哈塔·穆拉托维奇·哈桑斯帕希奇在一个混凝土升降梯门口说道。她每天都会乘这个电梯下到地下300米的地方采矿。哈塔是波斯尼亚中部山城布雷扎的一名煤矿工人。

虽然工作很辛苦,但哈塔仍希望她的儿子也能继续从事这门家传行业。在布雷扎,能在煤矿工作仍然被认为是一份很好的工作,因为收入稳定,而且不会拖欠。

在波斯尼亚和黑塞哥维那(简称“波黑”),就业机会很少,但煤炭资源丰富,这是这个巴尔干国家在中资海外燃煤电站建设热潮中找到的机会。目前在建的发电项目至少有六个,它们得到了中国“一带一路”倡议相关贷款的支持。

煤矿上的波黑

波黑主要依靠煤和水电来满足其能源需求,而在太阳能和风能等低碳技术的应用上步伐缓慢。该国褐煤储量高达13亿公吨。由于这种煤污染极其严重,无法出口到已禁止使用褐煤的欧盟国家。布雷扎的一个矿区负责 证实,他的矿区每年生产的70万吨煤大部分都用于国内消费。

波斯尼亚的失业问题非常严峻,因此政客们鼓励新建煤炭项目,以此来创造就业机会。根据世界银行的数据,2016年波斯尼亚失业率达到了25.1%。

但很多人对于由此产生的重大环境风险和经济收益的不确定性提出了警告:这些煤炭项目受到了公民社会团体、学者和环保人士的广泛反对。据公共财政研究和活动组织“银行监督”( )称,波斯尼亚拟建和在建的大型煤电项目共六个,预计总成本超过20亿欧元(24.4亿美元)。该组织发现,那些已知大致成本的项目都是由中国国有银行提供融资的。

而波斯尼亚的政治家们也乐于接受这些贷款。

在走访Kreka煤矿时,波黑三人主席团中的波什尼亚克族成员巴凯尔·伊兹贝戈维奇表示支持建设新的燃煤发电厂,以创造就业机会。同样,前联邦能源矿业和工业部长埃达尔在2014年表示,布戈伊诺新建的燃煤电厂将创造约1000个就业岗位。

“他们用这种论调赢得选民支持,宣称这是战后国内最大的投资,但这其实是贷款,”非政府组织“图兹拉生态与能源中心”( )的协调员Denis Žiško警告说。

他认为国家能源公司Elektroprivreda无力偿还贷款。当谈及图兹拉燃煤电厂时,他表示,“最终还是要我们,波黑的公民来偿还债务。”

根据波斯尼亚政府2018-2020年的预算,该项目将花费16.22亿波黑可兑换马克(约10亿美元)。

政治学家和前塞尔维亚外交官武克·瓦克萨诺维奇说:“或许应该更谨慎一些,但此时此刻,决策者们因经济未能实现复苏而承受着巨大的压力。”

“大多数(政治家)关心的都是连任和民意调查。战略家们的前瞻性只有三个月,而政治家们考虑事情不会超过一周,”他补充道。

英国上议院国际关系委员会一月份的一份报告指出,世界银行和国际货币基金组织已经就西巴尔干地区国家从中国借贷的风险发出了警告。报告指出,中国对黑山共和国的贷款额相当于这个小国GDP的四分之一,并且由于货币波动又增加了25%。

燃煤电厂新增的就业机会也可能少于预期值。根据联邦就业局的数据,截至2016年,波斯尼亚的矿区就业人数共8571人,国内薪资待遇最高的是能源部门。

然而,图兹拉大学教授、能源规划专家Mirza Kušuljgić表示,一些燃煤电厂的贷款条件中明确规定,在工程建设中应雇佣中国工人。他补充说,在2016年投入运营的斯坦纳瑞燃煤电厂有80%劳动力来自中国。

通往欧盟的大门?

然而,中国的贷款方从这些项目中寻求的可能不止是资金回报。

“因为这些都是政策性银行(提供贷款),比起项目的可行性,他们更感兴趣的是项目能够产生的政治资本,”盖洛普说道。“只要项目能回本就可以。”

对于中国庞大的基础设施和互联互通项目——“一带一路”而言,西巴尔干地区是它的另一个节点。

“中国的长期目标是欧盟,巴尔干地区国家是通往欧洲的关口,而且有一天甚至可能成为欧盟成员,” 瓦克萨诺维奇说。2018年2月,欧盟委员会再次重申,希望五月份在保加利亚首都索非亚举行区域峰会之前,包括波斯尼亚在内的巴尔干地区六国能够加入欧盟。

宽松的条款

2013年,中国对中欧和东南欧价值130亿美元的基础设施专项贷款项目启动,这些地区的政府迫切地希望利用这些贷款。

中国的贷款“为希望规避国际金融机构规定的领导人提供了另外的选择”,民主化政策委员会的联合创始人库尔特·巴斯纳在对英国上议院国际关系委员会的书面证词中说。

欧盟不愿意为褐煤项目提供财政支持,并且要求大大降低新电站的碳排放量,而中国则没那么挑剔。

欧盟成员国标准提出了包括法治、运输和能源连通在内的“六大旗舰举措”。为了加入欧盟,西巴尔干地区的国家受到反污染条例的约束,尽管这些条例不像对欧盟内部国家那样严格。

环保门槛

该地区国家都加入了旨在将非欧盟成员纳入能源共同市场的《能源共同体条约》(ECT)。塞尔维亚和波黑于2005年签署该条约,并且按要求,于今年开始正式执行减排规定。

据盖洛普表示,塞尔维亚政府对该条约中规定的义务缺乏理解。

中国在塞尔维亚的第一个煤炭项目是为科斯托拉茨的一个燃煤电厂升级污染控制设备,但这些设备并未达到《能源共同体条约》的要求。

“银行监督”在一份即将发布的报告中指出,中国已经正式承诺确保西巴尔干地区的项目符合欧盟和东道国的法律,但报告同时对中国“在遵守欧盟法律方面尽到独立尽职调查的能力或兴趣有多大”表示怀疑。

相反,地方政府才是这些项目背后的驱动力。“这些项目存在的主要原因是当地的决策者,”盖洛普说。“这是一种惯性。从历史上看,整个地区的基础设施都建立在水电和煤电之上。这是他们唯一信任的系统。

能源规划专家Kušuljgić认为,中国没那么严格的贷款方式也适合当地的决策者。

他表示,“中国在市场民主化、尊重环境等方面没有任何要求。他们唯一的要求是要有政府贷款担保。”

然而,波黑中央银行通信主管齐贾达·科瓦茨在邮件中对“中外对话”表示,“中国的投资仍处于初步协议和公告阶段。真正落地的[中国]投资仍然很少。”

但鉴于西方对投资波斯尼亚持谨慎的态度(根据美国国际贸易管理局的数据,2015年到2016年,该地区外国直接投资下降了近一半),中国的贷款意愿对波黑绝对是好消息。

中国并不是唯一一个投资西巴尔干地区煤炭项目的国家。2017年年底,中国尚未认可其主权的科索沃地区与美国能源公司ContourGlobal签署了一份60万千瓦燃煤电厂的建设协议。

根据比利时非政府组织“健康与环境联盟”的资料,这座燃煤电厂位于首都普里什蒂纳附近。普里什蒂纳已经是世界上污染最严重的城市之一,而电厂建成后,将使该市每年的公共卫生费用增加高达3.52亿欧元(4.36亿美元)。尽管如此,该项目得到了美国大使馆的极大支持,并得到了世行的部分风险担保。

Tuesday, August 14, 2018

ब्लॉग: उमर ख़ालिद की सुरक्षा गृह मंत्री राजनाथ सिंह की ज़िम्मेदारी

पाकिस्तान में उन्हें मियांवाली जेल में एक कालकोठरी में रखा गया जहाँ उन्हें रेडियो टेलीविज़न तो दूर, अख़बार तक उपलब्ध नहीं कराया गया.
शेख़ क़रीब नौ महीने तक उस जेल में रहे. छह दिसंबर से भारत-पाकिस्तान युद्ध ख़त्म होने तक यानी 16 दिसंबर के बीच एक सैनिक ट्राइब्यूनल ने उन्हें मौत की सज़ा सुना दी.
इस बीच पाकिस्तान की सत्ता ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के हाथ में आ गई. उन्होंने आदेश दिया कि मुजीब को मियांवाली जेल से निकाल कर रावलपिंडी के पास एक गेस्ट हाउस में ले जाया जाए.
कुलदीप नैयर अपनी आत्मकथा, बियॉन्ड द लाइन्स में लिखते हैं, "मुजीब ने मुझे बताया कि एक दिन अचानक भुट्टो उनसे मिलने गेस्ट हाउस आ गए. मुजीब ने उनसे पूछा, आप यहाँ कैसे? भुट्टो ने जवाब दिया, मैं पाकिस्तान का राष्ट्रपति हूँ. इस पर मुजीब हंसने लगे. बोले इस पद पर तो मेरा हक़ बनता है. भुट्टो सीधे मुद्दे पर आ गए. उन्होंने पेशकश की कि अगर शेख़ राज़ी हों तो विदेशी मामले, रक्षा और संचार विभाग को पाकिस्तान और बांग्लादेश मिल कर चलाएं."
कुलदीप नैयर ने बीबीसी को भी बताया, "शेख़ ने कहा कि इस समय मैं आपकी क़ैद में हूँ. अपने लोगों से सलाह मशविरा किए बग़ैर मेरे लिए कोई वचन देना संभव नहीं होगा."
बांग्लादेश के पूर्व विदेश मंत्री डॉक्टर कमाल हुसैन भी जो उस समय शेख़ के साथ पाकिस्तानी जेल में थे, वे इस बात की पुष्टि करते हैं.
वे बताते हैं, "भुट्टो आख़िरी समय तक पाकिस्तान के साथ कुछ न कुछ संबंध बनाए रखने के लिए दबाव डालते रहे. जिस दिन शेख़ को छोड़ा जाना था और वो लंदन के लिए उड़ान भरने वाले थे, भुट्टो ने कहा कि वो एक दिन और रुक जाएं क्योंकि अगले दिन ईरान के शाह आ रहे थे और वो उनसे मिलना चाहते थे. शेख़ समझ गए कि वो ईरान के शाह से उन पर दबाव डलवाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि भुट्टो का प्रस्ताव उन्हें मंज़ूर नहीं है. अगर वो चाहें तो उन्हें दोबारा जेल भिजवा सकते हैं."
सात जनवरी 1972 की रात, भुट्टो स्वयं मुजीब और कमाल हुसैन को छोड़ने रावलपिंडी के चकलाला हवाई अड्डे गए. उन्होंने बिना कोई शब्द कहे मुजीब को विदा किया और मुजीब भी बिना पीछे देखे तेज़ी से हवाई जहाज़ की सीढ़ियाँ चढ़ गए.
लंदन में दो दिन रुकने के बाद मुजीब नौ जनवरी की शाम ढाका के लिए रवाना हुए. रास्ते में वो कुछ घंटों के लिए नई दिल्ली में रुके.
डॉक्टर कमाल हुसैन याद करते हैं, "भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि, प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, उनका पूरा मंत्रिमंडल, सेना के तीनों अंगों के प्रमुख और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर राय, शेख़ के स्वागत में दिल्ली के हवाई अड्डे पर मौजूद थे. सबकी आँखे नम थीं. ऐसा लग रहा था कि किसी परिवार का पुनर्मिलन हो रहा हो."
सेना के कैंटोनमेंट के मैदान पर मुजीब ने एक जनसभा में बांग्लादेश के स्वाधीनता संग्राम में मदद करने के लिए भारत की जनता को धन्यवाद दिया. शेख़ ने अपना भाषण अंग्रेज़ी में शुरू किया. लेकिन तभी मंच पर मौजूद इंदिरा गांधी ने उनसे अनुरोध किया कि वो बांगला में भाषण दें.
दिल्ली में दो घंटे रुकने के बाद जब शेख़ ढ़ाका पहुंचे तो क़रीब दस लाख लोग उनके स्वागत में ढाका हवाई अड्डे पर मौजूद थे.
नौ महीने तक पाकिस्तानी जेल में रहने के बाद काफ़ी वज़न खो चुके शेख़ मुजीब ने अपने दाहिने हाथ से अपने बढ़े हुए बालों को पीछे किया और प्रधानमंत्री ताजउद्दीन अहमद ने आगे बढ़ कर अपने नेता को अपनी बाहों में भर लिया. दोनों की आँखों से आँसू बह निकले.
रेसकोर्स मैदान पर लाखों की भीड़ के सामने उन्होंने रबीन्द्रनाथ टैगोर को याद किया. महान कवि को उद्धृत करते हुए शेख़ ने कहा कि आपने एक बार शिकायत की थी कि बंगाल के लोग सिर्फ़ बंगाली ही बने रहे, अभी तक सच्चे इंसान नहीं बन पाए.
नाटकीय अंदाज़ में मुजीब ने कहा, "हे महान कवि वापस आओ और देखो किस तरह तुम्हारे बंगाली लोग उन विलक्षण इंसानों में तब्दील हो गएं हैं जिसकी कभी तुमने कल्पना की थी."
शेख़ मुजीब ने सत्ता संभाली और युद्ध से तहस-नहस बांग्लादेश के पुनर्निर्माण में लग गए. लेकिन हर परीकथा का एक दुखद अंत भी होता है. 1975 आते-आते चीज़ें उनके हाथ से निकलने लगीं.
भ्रष्टाचार बढ़ने लगा और भाई-भतीजावाद को शह मिलने लगी. लोगों में असंतोष के साथ-साथ सेना में भी असंतोष बढ़ने लगा.
15 अगस्त, 1975 की सुबह सेना के कुछ जूनियर अफ़सरों ने शेख़ के 32 धनमंडी स्थित आवास पर हमला बोल दिया. गोलियों की आवाज़ सुनते ही शेख़ ने सेनाध्यक्ष जनरल शफ़ीउल्लाह को फ़ोन मिलाया.
जनरल शफ़ीउल्लाह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि मुजीब बहुत ग़ुस्से में थे. उन्होंने कहा, ''तुम्हारे सैनिकों ने मेरे घर पर हमला बोल दिया है. उन्हें वापस आने का आदेश दो. मैंने उनसे पूछा कि क्या आप अपने घर से निकल कर बाहर आ सकते हैं?''
यहाँ पर सैयद बदरुल अहसन सेनाध्यक्ष के रवैए पर सवाल उठाते हैं. बीबीसी से उन्होंने कहा, "आप कैसे अपने राष्ट्रपति से इस तरह की बात कह सकते हैं. क्या आप ये सोच रहे थे कि वो अपने घर की दीवार फलांग कर सड़क पर आ जाएंगे और वो भी उस समय जब उनके चारों तरफ़ गोलियाँ चल रही हों."
नीचे हो रही गोलीबारी को सुन शेख़ सीढ़ियों से नीचे आ रहे थे कि उनपर गोली चलाई गई. मुजीब मुँह के बल गिर पड़े और नीचे तक गिरते चले गए. उनका फ़ेवरेट पाइप अभी भी उनके हाथ में था. इसके बाद मौत का तांडव शुरू हुआ.
पहले बेगम मुजीब को गोली मारी गई. फिर बारी आई उनके दूसरे पुत्र जमाल की. उनकी दोनों बहुओं को भी नहीं बख़्शा गया. और यहाँ तक कि उनके सबसे छोटे बेटे 10 साल के रसेल मुजीब को भी मौत के घाट उतार दिया गया.
एक ज़माने में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के दिल्ली में ब्यूरो प्रमुख रहे सुभाष चक्रवर्ती ने बीबीसी को बताया कि भारत के बांग्लादेश में तत्कालीन उच्चायुक्त शमर सेन उनके दोस्त थे. उन्होंने उन्हें बताया कि उस दिन 32 घनमंडी में वास्तव में क्या हुआ था.
उन्होंने कहा, "जब ये लोग मुजीब के घर में घुसे तो वो बाहर आए. उन्हें लगा कि वो ग़लती से उनके घर में घुस आए हैं. उन्होंने चिल्ला कर कहा तुम चाहते क्या हो. उन्हें अंदाज़ा ही नहीं था कि वो लोग उन्हें मारने आए हैं. उन्हें मारा गया, बेरहम तरीक़े से और मारने के बाद उन्हें किसी के कंधे पर नहीं बल्कि घसीटते हुए घर से बाहर लाया गया और इंतज़ार करते हुए ट्रक में फेंक दिया गया."
16 अगस्त की सुबह सैनिकों ने सारे शवों को इकट्ठा किया और मुजीब को छोड़ कर सबको बेनानी क़ब्रिस्तान में एक बड़े गड्ढ़े में दफ़ना दिया. मुजीब के शव को हेलिकॉप्टर से उनके पैतृक गाँव टांगीपारा ले जाया गया.
सैनिकों ने उनके गाँव को घेर लिया ताकि लोग उनकी नमाज़े जनाज़ा में शरीक न हो पाएं. सैनिक ज़ोर दे रहे थे कि शव को जितनी जल्दी हो सके दफ़नाया जाए. लेकिन गाँव का एक मौलाना इस बात पर अड़ गया कि शव को बिना नहलाए दफ़नाया नहीं जा सकता.
बदरुल अहसन लिखते हैं कि गाँव में नहलाने के लिए कोई साबुन उपलब्ध नहीं था. अंतत: उन्हें कपड़ा धोने वाले खुरदरे साबुन से नहलाया गया और उनके पिता की क़ब्र के बग़ल में दफ़ना दिया गया.
उस शाम बारिश शुरू हुई तो उसने रुकने का नाम नहीं लिया. गाँव के बड़े बूढ़ों को कहते सुना गया, ''उनको जिस नृशंसता से मारा गया, शायद प्रकृति भी उसे बर्दाश्त नहीं कर पाई.''
मूसलाधार बारिश उसके आँसुओं का प्रतीक थी. लेकिन इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि उस शाम बांग्लादेश के राष्ट्रपिता के लिए आंसू बहाने वाले बहुत कम लोग थे.