Wednesday, September 19, 2018

亚马逊原住民:誓与森林共存亡

星期三,一支由土著领袖组成的队伍沿着伦敦的白厅街肃穆无声地行进,抗议对其土地的野蛮破坏和对其人民的迫害。

很多人都举着标语牌,上面贴着被害家人和同胞的照片,另一些人拿着当地森林中灭绝鸟兽的海报,还有的人则焚烧鼠尾草,这被视为一种净化行为。

这场游行由来自巴西、法属圭亚那、巴拿马和印度尼西亚的土著领袖们主导。他们乘坐大巴在欧洲各地巡游,为的是在11月6日召开的波恩联合国气候峰会之前把自己的信息传达出去。

在英国皇家学会的一次新闻发布会上,土著领袖们呼吁各国政府及其公民支持停止对全世界土著人的杀害和犯罪行为,停止掠夺土地权和破坏土著领地。他们还呼吁将更多的气候资金用于保护森林,因为这是地球上储存碳排放、应对气候变化最有效的方式之一。

“如果今天仍然有森林耸立在那里,是因为我们还活着。”亚马逊流域土著协调组织( )的总协调员索尼娅
·瓜加迦拉说,“我们正遭到农业综合企业利得者的野蛮攻击,而这一模式的发源地正是英国。”

她说:“如果没有森林的话,任何经济都无法生存。”

根据“全球见证”的报告《
危险之地》,去年有200位环境保护者被杀,其中50位来自巴西。

瓜加迦拉说:“我们躲避枪手的子弹,通过我们的精神力量来维持自己的文化,但他们却要毁掉我们周围所有生命。”她来自马拉尼昂州的瓜加迦拉部落,这是巴西最大的土著群体。
今年八月,巴西总统特梅尔废除了亚马逊地区国家铜矿及其他矿物保护区( )(一片4.7万公顷的受保护雨林),并向采矿行业开放,引发环保主义者的激烈抗议。他们指控巴西政府以牺牲巴西的环境为代价,出售能源和采矿合约,换取金融投资。

一些项目涉及中国企业,如亚马逊河一条主要支流上的贝卢蒙蒂水电站大坝。2015年,该水电站的水库泛滥造成2万人被迫迁移。此外还有让与世隔绝的部落面临失去家园危险的洲际铁路项目。

瓜加迦拉将米纳斯吉拉斯州的萨马科溃坝事故称为“生态灭绝罪行”。该事故造成19人死亡,毁掉了沿河居民的生计。她还提到伯南布哥州正在发生的由土地争议和废止土著权利而引发的警方暴力袭击事件。

她呼吁欧盟和各国政府支持对那些毁坏森林、污染河流和海洋的企业进行制裁。

她说:“未经人们同意就推进建设计划,然后再挂上清洁能源的旗号出售。那些火烧森林者必须因反人道而受到惩罚。”


资金缺口

就在土著领袖游行的同时,环保团体“气候焦点”与“纽约森林宣言进展”发布了一份新的有关森林融资的
报告。后者是一个由15家非盈利机构组成的联盟,呼吁在2030年之前停止天然林面积缩减。

报告指出,2010年以来各国政府和多边贷款机构提供的气候资金中只有2%被用来保护森林。另一方面,要实现控制全球温升2摄氏度以内的巴黎气候目标,必须减缓气候变化,而森林对减缓的贡献率则可多达三成。

“气候焦点”的土地利用高级顾问弗朗西斯卡
·豪普特说,在硬木、大豆、棕榈油、黄金、汽油、水电和工业化农业生产的驱动下,全球毁林在2015年和2016年再创新高,造成了“毁林速度大幅加剧”。

该报告还指出, 年以来全球对农业和土地开发的投资高达7770亿美元,相比之下用于遏制毁林的只有微不足道的200亿美元。

国际环境与发展研究所的克莱尔
·沙克亚说,只有不足10%的气候资金最终能够到达这些社区的第一线。

非政府组织“权利与资源”的战略分析和全球参与主管阿兰·弗雷切特说,事实证明由社区保护的森林毁林率更低、碳储存率更高。

社区森林所封存的碳平均比其他森林高出36%,而毁林率则只有其十一分之一。

Thursday, September 13, 2018

हैदराबाद के निज़ाम म्यूज़ियम में सोने के बर्तनों के अलावा क्या-क्या है?

दराबाद की पुरानी हवेली के मसरत महल में मौजूद निज़ाम संग्रहालय बीते कुछ दिनों से अख़बारों की सुर्खियों में है.
हाल ही में निज़ाम संग्रहालय से सोने से बने कप-प्लेट, चम्मच और लंच बॉक्स चोरी हो गए थे.
मंगलवार को पुलिस ने इन चोरों को पकड़ लिया और चोरी किए गए बेशक़ीमती सामान भी बरामद कर लिए.
ये सारी बेशक़ीमती चीज़ें हैदराबाद के सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान से जुड़ी हुई थीं, जिन्होंने साल 1911 से लेकर 1948 तक हैदराबाद रियासत पर शासन किया था.
बताया जाता है कि अपने शासनकाल के दौरान निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान का नाम विश्व के कुछ सबसे अमीर लोगों में शुमार था.
इस संग्रहालय में मौजूद कलाकृतियाँ बेशक़ीमती तो हैं ही, बल्कि दक्कन सभ्यता से भी जुड़ी हुई हैं और इनका अपना ऐतिहासिक महत्व है.
निज़ाम के प्रपौत्र नजफ़ अली ख़ान ने बीबीसी से कहा कि संग्रहालय में रखी हर चीज़ और ख़ासकर चोरी की गई चीजें, जो अब बरामद कर ली गई है, उनके परदादा के दिल के काफ़ी करीब थीं.
नजफ़ अली ख़ान बताते हैं कि जब्त किया गया लंच बॉक्स शुद्ध सोने का बना हुआ है और उसमें बेशकीमती हीरे और माणिक जड़े हुए हैं.
वो बताते हैं कि दो किलो वज़न का वो लंच बॉक्स निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान को किसी ने तोहफे में दिया था. हालांकि तोहफा देने वाले के बारे में अब कोई जानकारी मौजूद नहीं है.
नजफ़ अली ख़ान संग्रहालय में चीज़ों के रखरखाव पर असंतुष्टि जताते हुए कहते हैं, "ये बहुत दुख की बात है कि उनकी निजी और बेशकीमती संपत्ति चोरी कर ली जाती है."
वो कहते हैं कि लापरवाही की वजह से ऐसा हुआ था.
म्यूज़ियम को जाने वाली लकड़ी की सीढ़ियों के बुरे हाल का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं कि जिस तरीके से निज़ाम के सामान की देखरेख की जा रही है वो चिंताजनक है.
नजफ़ अली ख़ान बताते हैं कि इस समय म्यूज़ियम में सातवें निज़ाम के पहने हुए सूट, इत्र की शीशियां, उनकी जूतियां, टोपियां और झोले रखे हुए हैं.
साथ ही सोने और चांदी की बनी हुई कलाकृतियां भी रखी गई हैं, जिन्हें अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोगों ने कभी निज़ाम को तोहफ़े के रूप में दी थीं.
नजफ़ अली ख़ान बताते हैं, "जब भी सातवें निज़ाम विकास का कोई काम शुरू करवाते थे तो आम लोग उन्हें चांदी से बनी हुई खुरपी भेंट किया करते थे."
"हाथी दांत से बने हैंडल वाली ऐसी ही एक खुरपी से ओस्मान सागर की नींव रखी गई थी. इस खुरपी को इस समय निज़ाम म्यूज़ियम में देखा जा सकता है."
अपने शासन काल में हैदराबाद के सातवें निज़ाम ने ओस्मान सागर और हिमायत सागर नाम की दो झीलों का निर्माण कराया था.
नज़फ़ अली कहते हैं "इसके साथ ही ओस्मानिया यूनिवर्सिटी आर्ट कॉलेज (बिल्डिंग), मोज़ामजही बाज़ार, नामपल्ली रेलवे स्टेशन, हाई कोर्ट बिल्डिंग, ओस्मानिया अस्पताल, निलोफ़र अस्पताल की छोटे आकार की 500 से ज़्यादा चांदी से बनी हुई कृतियां मौजूद हैं."
नजफ़ अली ख़ान बताते हैं कि म्यूज़ियम में मौजूद कलाकृतियों की कीमत इस समय चार सौ करोड़ रुपये से ज़्यादा होगी.
इस संग्रहालय में लकड़ी की बनी हुई वो लिफ़्ट भी मौजूद है जिसकी मदद से निज़ाम हर रोज़ मसरत महल की सबसे ऊंची इमारत के फ्लोर पर पहुंचते थे.
इसके अलावा म्यूजियम में निज़ाम की अलमारी भी देखी जा सकती है, जिसकी 140 दराज़ों में निज़ाम के शाही कपड़े रखे जाते थे.
नजफ़ बताते हैं कि फ़लकनुमा महल के मैदान में रोल्स रॉयस और जगुआर गाड़ियां देखी जा सकती हैं, जिनको निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान बेहद पसंद किया करते थे.
अपने परदादा की दरियादिली को याद करते हुए नजफ़ बताते हैं कि उन्होंने निज़ाम इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस को सरकार को सिर्फ एक रुपये की लीज़ पर दिया था.
निज़ाम संग्रहालय की स्थापना साल  में ज़रूर हुई हो, लेकिन इसकी स्थापना का विचार लगभग 60 साल पहले ही सामने आया था.
म्यूज़ियम को चलाने वाले निज़ाम ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी और इतिहासकार मोहम्मद सैफीउल्लाह कहते हैं कि निज़ाम मीर उस्मान अली ने 29 अगस्त 1911 में सत्ता संभाली थी और 17 सितंबर 1948 तक दक्कन पर शासन किया.
वो कहते हैं कि 1937 में उनके शासन के 25 साल पूरे होने के मौके पर एक संग्रहालय खोलने का विचार सामने आया था, जिसमें निज़ाम इस मौक़े पर दिए गए तोहफों को रखने की बात कही गई थी.स संग्रहालय में गोल्ड प्लेटेड सिंहासन, पालवंचा राजाओं द्वारा दी गई इत्र की शीशियां, मैसूर के राजाओं की दी गई हाथी दांत से बनी चारमीनार की छोटी कलाकृति मौजूद है.
साथ ही फ्रांस से आए हुए सिरेमिक से बने चाय के कप, लंदन से आए हुए कॉफी कप, बसरा कस्बे की छोटी कलाकृति और मोती जड़ित छड़ी जैसी चीज़ें मौजूद हैं.
मोहम्मद सैफीउल्लाह ने निज़ाम के इतिहास के बारे में कई किताबें लिखी हैं और निज़ाम की लिखी कई चिट्ठियों का भी संकलन किया है.

Monday, September 3, 2018

प्लास्टिक से पीछा छुड़ाने के लिए क्या करना होगा?

हाल ही में देश के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ने प्लास्टिक पर पाबंदी लगा दी. ये पाबंदी हर तरह के प्लास्टिक पर तो नहीं लागू होगी. मगर, पर्यावरण के लिए ज़्यादा नुक़सानदेह मानी जाने वाली प्लास्टिक पर इन राज्यों ने रोक लगा दी है.
भारत में प्लास्टिक पर पाबंदी की मांग ज़ोर-शोर से उठती रही है. भारत ही क्यों, दुनिया के कई देशों में इस पर पाबंदी लगी है.
वैसे इस पाबंदी पर भी शर्तें लागू हैं. मगर, आज प्लास्टिक को दुनिया में इंसानियत ही नहीं हर तरह के जीव के लिए दुश्मन के तौर पर देखा जाता है.
प्लास्टिक के कचरे से पूरी दुनिया परेशान है. समंदर हो या नदियां. पहाड़ हों, दूर स्थित द्वीप हों या मैदान, हर जगह प्लास्टिक के कचरे से प्रदूषण और पर्यावरण को भारी नुक़सान हो रहा है.
क्लेयर वालुडा, ब्रिटेन के अंटार्कटिक सर्वे के लिए काम करती हैं. वो साउथ जॉर्जिया के तट पर टहलते हुए, चट्टानों के बीच एक प्लास्टिक की बोतल फंसी देखती हैं, तो उसे निकालती हैं.
ये प्लास्टिक के उन सैकड़ों टुकड़ों में से एक है, जो क्लेयर को अक्सर इस सुदूर द्वीप के किनारे पड़े मिल जाते हैं.
साउथ जॉर्जिया, अटलांटिक महासागर के दक्षिणी हिस्से में स्थित छोटा का जज़ीरा है. यहां से जो सबसे नज़दीकी इंसानी बस्ती है, वो भी यहां से क़रीब 1500 किलोमीटर दूर है. लेकिन, समंदर की लहरें, इस द्वीप के किनारे पर हमारी लापरवाही के निशान छोड़ जाती हैं.
हम इस्तेमाल के बाद बड़ी बेपरवाही से प्लास्टिक की बोतलें या दूसरे सामान फेंक देते हैं. दक्षिणी जॉर्जिया द्वीप पर क्लेयर को मिली प्लास्टिक की बोतल, इसी लापरवाही का सबूत है.
क्लेयर को अक्सर यहां के परिंदों के गलों में अटके प्लास्टिक के टुकड़े मिल जाते हैं. और ये तो बहुत छोटी सी मिसाल है. पूरी दुनिया में हर साल पैकेजिंग के लिए क़रीब आठ करोड़ टन प्लास्टिक तैयार की जाती है.
ये उद्योग क़रीब दो सौ अरब डॉलर का है. आठ करोड़ टन प्लास्टिक का बेहद मामूली हिस्सा ही रिसाइकिल होता है. बाक़ी का प्लास्टिक धरती पर यूं ही जर्मनी से लेकर अंटार्कटिका तक फ़ैलता रहता है.
मीडिया में प्लास्टिक की वजह से फ़ैलते प्रदूषण को लेकर तमाम रिपोर्ट आती रहती हैं. बीबीसी के ब्लू प्लैनेट 2 शो में भी सर डेविड एटेनबरो ने समंदर में प्लास्टिक से पैदा हो रही परेशानियों के बारे में बताया था. जनता की बढ़ती फ़िक्र देखकर कई देशों की सरकारें और कंपनियां प्लास्टिक के बेतहाशा इस्तेमाल को रोकने के लिए कई क़दम उठा रही हैं.
पर, बड़ा सवाल ये है कि आज हमें जिस तरह प्लास्टिक की लत लग गई है, उसमें बुनियादी तौर पर बदलाव कैसे लाया जा सकता है?
कई कंपनियां हैं, जो प्लास्टिक के कचरे का उत्पादन कम करने की कोशिश कर रही हैं. इसके लिए वो अपने मुनाफ़े से भी समझौता कर रही हैं. जैसे कि कोका-कोला कंपनी हर साल केवल ब्रिटेन में ही 38,250 टन प्लास्टिक पैकेजिंग में इस्तेमाल करती है. ब्रिटेन में कोका-कोला 110 अरब प्लास्टिक की ऐसी बोतलों में अपने उत्पाद बेचती है, जिन्हें सिर्फ़ एक बार इस्तेमाल में लाया जा सकता है.
अब कोका-कोला ने वादा किया है कि वो ऐसी प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ाएगी जिन्हें रिसाइकिल किया जा सकता है. इससे उसकी लागत बढ़ेगी.
दुनिया के क़रीब 60 देशों ने प्लास्टिक की थैलियों और सिर्फ़ एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक के उत्पादन पर क़ाबू पाने के लिए क़ानून बनाए हैं. इसी महीने वनुआतू नाम का छोटा सा देश एक बार इस्तेमाल होने वाले हर तरह के प्लास्टिक पर रोक लगाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया.
टेस्को और वालमार्ट जैसे मल्टीनेशनल स्टोर्स ने पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक की मात्रा में कटौती का वादा किया है. कोका-कोला के अलावा पेप्सी, नेस्ले, यूनीलीवर और लॉरियल जैसी कंपनियों ने दोबारा इस्तेमाल हो सकने वाले प्लास्टिक के ज़्यादा इस्तेमाल का वादा किया है. इन कंपनियों ने प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने के लिए 2025 तक का टारगेट रखा है.
परेशानी इस बात की है कि अभी ये कंपनियां वो तरीक़ा नहीं खोज पायी हैं, जिनसे प्लास्टिक के इस्तेमाल में कटौती कर सकें. उसका विकल्प तलाश सकें.
बहुत से जानकार चिंता जता रहे हैं कि सही विकल्प न तलाशने पर, हमारे लिए इन कंपनियों के उत्पाद ख़रीदना महंगा हो सकता है.
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इलियट व्हिटिंगटन कहते हैं कि, 'ये बात इतनी आसान नहीं है कि प्लास्टिक ख़राब चीज़ है, तो चलो उसकी जगह कुछ और इस्तेमाल करते हैं. प्लास्टिक से पीछा छुड़ाने के लिए हमें अपनी आदतें बदलनी होंगी. पैकेजिंग उद्योग को एकदम नई सोच के साथ काम करना होगा. अभी पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक को एक बार प्रयोग कर के फेंक दिया जाता है. हमें इस आदत से पीछा छुड़ाना होगा. सरकार को इसकी अगुवाई करनी होगी'.
इस वक़्त यूरोप में जो खाना बिकता है, उसका एक तिहाई प्लास्टिक में पैक किया जाता है. यूरोप में रहने वाला हर शख़्स हर साल 31 किलो प्लास्टिक का कचरा निकालता हैप्लास्टिक के इस कदर बढ़े इस्तेमाल की सबसे बड़ी वजह है कि इसे बहुत कम लागत में तैयार किया जा सकता है. जैसे कि कांच की बोतल, प्लास्टिक की बोतल से काफ़ी महंगी पड़ती है. फिर उसे लाने-ले जाने में भी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है. जबकि प्लास्टिक को आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है. ये हल्का होता है.
आज से पचास साल पहले प्लास्टिक की क्रांति आने से पहले, ज़्यादातर पेय पदार्थ कांच की बोतलों में बिकते थे. आज की तारीख़ में कमोबेश हर पेय पदार्थ प्लास्टिक में पैक होकर बिकता है. इसे हम पॉलीथिलीन टेरेप्थैलेट या PET के नाम से जानते हैं. कांच के मुक़ाबले प्लास्टिक की बोतल बनाना सस्ता पड़ता है. लेकिन, ये फ़र्क़ बहुत ज़्यादा नहीं है.
मुश्किल आती है, इन पैकेज्ड बोतलों को कहीं ले जाने में. 330 मिलीलीटर ड्रिंक भरने वाली प्लास्टिक की बोतल का वज़न 18 ग्राम होता है. वहीं कांच की बोतल का वज़न 190 से 250 ग्राम तक हो सकता है. इन भारी बोतलों को कहीं ले जाने में 40 फ़ीसद ज़्यादा ईंधन ख़र्च होगा. ज़ाहिर है ज़्यादा तेल जलेगा, तो पर्यावरण को नुक़सान भी ज़्यादा होगा. पर्यावरण के लिहाज़ से देखें, तो प्लास्टिक की बोतल के मुक़ाबले कांच की बोतल को कहीं ले जाने में पांच गुना ज़्यादा प्रदूषण होगा.
अमरीका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ पैकेजिंग की सूसन सेल्के कहती हैं कि कई मायनों में प्लास्टिक पर्यावरण के लिए, दूसरे विकल्पों से बेहतर है.
अमरीकी केमिस्टिरी काउंसिल और पर्यावरण अनुसंधान करने वाली कंपनी ट्रूकॉस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, अगर सॉफ्ट ड्रिंक बनाने वाली कंपनियां प्लास्टिक की जगह कांच, एल्यूमिनियम या टिन का इस्तेमाल करने लगें, तो इससे पांच गुना ज़्यादा पर्यावरण प्रदूषण फैलेगा. अब सरकारें, प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों पर टैक्स लगाने लगी हैं. तो, इसका असर ग्राहकों पर भी पड़ेगा.
ब्रिटिश पैकेजिंग फेडरेशन के डिक सियर्ले कहते हैं कि खाने-पीने का सामान प्लास्टिक पर रोक की वजह से महंगा हो जाएगा. दूध पैक करने के लिए कांच की बोतलों का इस्तेमाल करने से इसकी क़ीमत बढ़ जाएगी.
तो इसका क्या मतलब हुआ कि लागत बढ़ेगी, तो उसे ग्राहकों पर डाल दिया जाएगा?
ब्रिटिस सुपरमार्केट चेन आइसलैंड ने 2023 तक अपनी पैकेजिंग से प्लास्टिक को पूरी तरह से हटा देने का लक्ष्य रखा है. इसकी जगह वो कांच और सेल्यूलोज़ का इस्तेमाल करेगी. कंपनी यक़ीन दिला रही है कि वो इसका बोझ ग्राहकों पर नहीं डालेगी.
वैसे, बहुत से ऐसे लोग हैं कि हम 70 साल से प्लास्टिक का इस्तेमाल पैकेजिंग के लिए कर रहे हैं. अचानक इस पर पाबंदी लगी, तो इसकी क़ीमत हम कई तरह से चुकाएंगे.
आप अक्सर बड़े स्टोर्स में सब्ज़ियों, जैसे लौकी या खीरे को प्लास्टिक में लिपटा हुआ देखते हैं. आप को लगता होगा कि ज़बरदस्ती प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जा रहा है. मगर, इसकी हक़ीक़त अलग ही है. प्लास्टिक में लपेटकर दरअसल उन सब्ज़ियों की उम्र बढ़ा दी जाती है. वो जल्दी ख़राब नहीं होती हैं.
ब्रिटेन की शेफील्ड यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री के प्रोफ़ेसर एंथनी रेयान कहते हैं, 'खाने को बर्बाद होने से बचाने में प्लास्टिक के रोल को लोग बहुत कम कर के आंकते हैं'.
जैसे कि प्लास्टिक में लिपटे खीरे की उम्र खुले में रखे खीरे से ज़्यादा होती है. इसे यूं ही प्लास्टिक में लपेटकर फ्रिज में क़रीब 15 दिनों तक रखा जा सकता है. इससे खाने की बर्बादी में 50 फ़ीसद तक की कटौती की जा सकती है. खुले में खीरा केवल दो दिन तक ठीक रह सकता है. वहीं फ्रिज में खुला डालने पर ये एक हफ़्ते तक सड़ने से बचा रहेगा.
तमाम तरह के मांस की पैकेजिंग भी प्लास्टिक में होती है. इससे कच्चा मांस ज़्यादा दिनों तक सुरक्षित रहता है. बर्बादी कम होती है.
खाने-पीने का ज़्यादातर सामान हम प्लास्टिक की पैकेजिंग में ही देखते हैं. इससे इनके इस्तेमाल कर पाने का का वक़्त बढ़ जाता है. जैसे कि अंगूरों को प्लास्टिक के डिब्बों में रखने से इनकी बर्बादी 75 फ़ीसद तक कम हो जाती है. इसी तरह दूसरे फलों को भी प्लास्टिक की पैकेजिंग की मदद से बर्बाद होने से बचाया जाता है.
प्लास्टिक में पैक खाने-पीने के सामान की उम्र केवल एक दिन बढ़ाने से ब्रिटेन के लोगों के क़रीब 50 करोड़ पाउंड बचते हैं.
दुनिया भर में पहले ही हर साल क़रीब एक खरब डॉलर का खाना बर्बाद होता है. इस नुक़सान को ज़्यादातर उत्पाद तैयार करने वाले या खुदरा दुकानदार उठाते हैं. केवल एक बार इस्तेमाल हो सकने वाले प्लास्टिक की मदद से खाने की चीज़ों की इस बर्बादी पर लगाम लगाने में मदद मिलती है.
अब इन बातों की रोशनी में प्लास्टिक पर पूरी तरह से पाबंदी ठीक नहीं लगती.
इलियट व्हिटिंगटन कहते हैं कि, 'प्लास्टिक पर रोक की बात करने के बजाय हमें आगे की सोच रखनी होगी. आज बहुत सी कंपनियां ऐसा प्लास्टिक बना रही हैं, जो क़ुदरती तौर पर ख़ुद ही नष्ट हो जाएगा.' इस बायोप्लास्टिक को बनाने में स्टार्च या प्रोटीन का इस्तेमाल होता है. हालांकि ये पूरी तरह से जैविक प्लास्टिक नहीं होते. मगर काफ़ी हद तक ये पर्यावरण में घुल-मिल जाते हैं.
ब्रिटिश स्किनकेयर कंपनी बुलडॉग ऐसे ही बायोप्लास्टिक का इस्तेमाल करती है. ये नई ट्यूब महंगी हैं. लेकिन, ये पर्यावरण के लिहाज़ से बेहतर विकल्प हैं.